अखिलेश-मायावती: दुश्मनी से दोस्ती तक की पूरी कहानी
ये नवंबर, 2016 की बात है. उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बहुत ज़्यादा दिन नहीं बचे थे. सार्वजनिक तौर पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने तबके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को 'बबुआ' और इससे भी आगे 'समाजवादी बबुआ' कहा था.
दरअसल अखिलेश यादव अपने संबोधनों में मायावती को बुआ कहते रहे थे और इसकी वजह भी देते थे. लेकिन चुनावी मौके पर उन्होंने मीडिया में मायावती की बढ़ती ख़बरों पर कहा था कि बुआ ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन जैसे मीडिया हो गया है.
हालांकि इससे करीब तीन साल पहले दिसंबर, 2016 में टीवी चैनल आजतक के एक प्रोग्राम में अखिलेश यादव ने एंकर को टोकते हुए कहा था कि मायावाती जी को 'हमलोग तो बहन जी नहीं कह सकते, बुआ जी कह सकते हैं.'
चूंकि अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव के साथ मायावती उत्तर प्रदेश में गठबंधन सरकार बना चुकी थीं, लिहाजा सामाजिकता के तकाजे से के मुताबिक ही मायावती को बुआ कहते रहे.
ऐसे में जब मायावती ने अखिलेश को बबुआ कहा तो एक तरह से इसने दोनों पार्टियों की आपसी तकरार को हवा दे दी. मीडिया में इसको लेकर ख़ूब हेडलाइंस बनीं.
किन देखते देखते उत्तर प्रदेश का वो चुनाव हो गया जिसमें नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग के बूते भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ 325 सीट जीतने में कामयाब रही.
लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे से आने ठीक पहले अखिलेश यादव ने बीबीसी हिंदी को दिए इंटरव्यू में इस बात के संकेत दे दिए कि ज़रूरत पड़ने पर वे मायावती से भी समर्थन मांग सकते हैं.
गोरखपुर-फूलपुर के नतीजे
हालांकि इसकी नौबत नहीं आई, लेकिन ये सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी कि क्या समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी एक साथ मंच पर आ सकती हैं.
करीब एक साल के बाद गोरखपुर और फूलपुर सीट पर लोकसभा सीटों के उपचुनाव आ गए और इन दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार का मुक़ाबला सीधे बीजेपी के उम्मीदवार से था. गोरखपुर योगी आदित्यानाथ की छोड़ी हुई सीट थी, जबकि फूलपुर सीट योगी के डिप्टी केशवचंद्र मौर्या की.
बहुजन समाज पार्टी का इतिहास रहा है कि वो उपचुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करती. ऐसे में अखिलेश ने रणनीति अपनाते हुए गोरखपुर के लिए निषाद पार्टी से संपर्क साधा और दोनों जगह अपने उम्मीदवार उतारे.
इस उपचुनाव में मायावती ने आधिकारिक तौर पर समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा नहीं की थी, लेकिन पार्टी ने अंदर अंदर ही समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा कर दी.
बहुजन समाज पार्टी के फूलपूर और गोरखपुर के संयोजक अशोक सिद्धार्थ और घनश्याम खड़वाड़ ने पार्टी का संदेश अपने मतदाताओं तक पहुंचा दिया था.
दोनों जगहों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर वह आधार बना दिया, जिसने मोदी-शाह की बीजेपी को पहली बार चौंका दिया था.
नतीजे जिस दिन आए, उसी दिन समाजवादी पार्टी के विधानमंडल के नेता रामगोविंद चौधरी और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती की मुलाकात हुई.
रामगोविंद चौधरी बताते हैं, "बसपा विधानमंडल के नेता लालजी वर्मा के पुत्र के निधन की शोक सभा थी, वहीं हम मिले थे और मायावती जी का संदेश हमने अपनी पार्टी के अध्यक्ष जी तक पहुंचा दिया था."
समर्थन का आभार
उस मुलाकात के दौरान रामगोविंद चौधरी और मायावती, एक दूसरे को हाथ जोड़कर मिलते हुए दिखाई दिए थे. ये मायावती की अपनी स्टाइल से बिलकुल अलग उदाहरण था, राम गोविंद चौधरी भी बसपा के आलोचकों में गिने जाते रहे थे.
राम गोविंद चौधरी से मिले संदेश के बाद ही अखिलेश यादव 15 मार्च, 2018 को मायावती से लखनऊ स्थित उनके आवास पर मिलने पहुंचे. ये मुलाकात सवा घंटे चली, जिसमें अखिलेश यादव ने मायावती को समर्थन देने के लिए आभार जताया और ये भी याद दिलाया कि 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम जब आपस में मिले थे, तब दोनों ने बीजेपी को रोक दिया था.
इस मुलाकात के क़रीब एक सप्ताह बाद ये सवाल सामने था कि क्या अखिलेश, मायावती जी को रिर्टन गिफ्ट दे पाएंगे. राज्यसभा का चुनाव 23 मार्च को हुआ, जिसमें अखिलेश यादव तमाम कोशिशों के बाद भी बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार भीमराव आंबेडकर को जीत नहीं दिला पाए.
ऐसे में दोनों पार्टियों के बीच जो कांफिडेंस बिल्ड अप हो रहा था, उसको धक्का लगा. राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तब चुटकी लेते हुए कहा था, "समाजवादी पार्टी का अवसरवादी चेहरा लोगों ने देखा है, वह दूसरों से ले तो सकती है, दूसरों को दे नहीं सकती है."
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी थोड़े चिंतित ज़रूर हुए थे, लेकिन मायवती की प्रेस कांफ्रेंस ने वो चिंता दूर कर दी. मायावती ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि अपने उम्मीदवार की हार के बाद भी समाजवादी पार्टी पर उनका भरोसा कायम है और 'मेरी इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद बीजेपी वालों को फिर नींद नहीं आएगी.'
दरअसल अखिलेश यादव अपने संबोधनों में मायावती को बुआ कहते रहे थे और इसकी वजह भी देते थे. लेकिन चुनावी मौके पर उन्होंने मीडिया में मायावती की बढ़ती ख़बरों पर कहा था कि बुआ ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन जैसे मीडिया हो गया है.
हालांकि इससे करीब तीन साल पहले दिसंबर, 2016 में टीवी चैनल आजतक के एक प्रोग्राम में अखिलेश यादव ने एंकर को टोकते हुए कहा था कि मायावाती जी को 'हमलोग तो बहन जी नहीं कह सकते, बुआ जी कह सकते हैं.'
चूंकि अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव के साथ मायावती उत्तर प्रदेश में गठबंधन सरकार बना चुकी थीं, लिहाजा सामाजिकता के तकाजे से के मुताबिक ही मायावती को बुआ कहते रहे.
ऐसे में जब मायावती ने अखिलेश को बबुआ कहा तो एक तरह से इसने दोनों पार्टियों की आपसी तकरार को हवा दे दी. मीडिया में इसको लेकर ख़ूब हेडलाइंस बनीं.
किन देखते देखते उत्तर प्रदेश का वो चुनाव हो गया जिसमें नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग के बूते भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगी दलों के साथ 325 सीट जीतने में कामयाब रही.
लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे से आने ठीक पहले अखिलेश यादव ने बीबीसी हिंदी को दिए इंटरव्यू में इस बात के संकेत दे दिए कि ज़रूरत पड़ने पर वे मायावती से भी समर्थन मांग सकते हैं.
गोरखपुर-फूलपुर के नतीजे
हालांकि इसकी नौबत नहीं आई, लेकिन ये सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी कि क्या समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी एक साथ मंच पर आ सकती हैं.
करीब एक साल के बाद गोरखपुर और फूलपुर सीट पर लोकसभा सीटों के उपचुनाव आ गए और इन दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार का मुक़ाबला सीधे बीजेपी के उम्मीदवार से था. गोरखपुर योगी आदित्यानाथ की छोड़ी हुई सीट थी, जबकि फूलपुर सीट योगी के डिप्टी केशवचंद्र मौर्या की.
बहुजन समाज पार्टी का इतिहास रहा है कि वो उपचुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करती. ऐसे में अखिलेश ने रणनीति अपनाते हुए गोरखपुर के लिए निषाद पार्टी से संपर्क साधा और दोनों जगह अपने उम्मीदवार उतारे.
इस उपचुनाव में मायावती ने आधिकारिक तौर पर समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा नहीं की थी, लेकिन पार्टी ने अंदर अंदर ही समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा कर दी.
बहुजन समाज पार्टी के फूलपूर और गोरखपुर के संयोजक अशोक सिद्धार्थ और घनश्याम खड़वाड़ ने पार्टी का संदेश अपने मतदाताओं तक पहुंचा दिया था.
दोनों जगहों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर वह आधार बना दिया, जिसने मोदी-शाह की बीजेपी को पहली बार चौंका दिया था.
नतीजे जिस दिन आए, उसी दिन समाजवादी पार्टी के विधानमंडल के नेता रामगोविंद चौधरी और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती की मुलाकात हुई.
रामगोविंद चौधरी बताते हैं, "बसपा विधानमंडल के नेता लालजी वर्मा के पुत्र के निधन की शोक सभा थी, वहीं हम मिले थे और मायावती जी का संदेश हमने अपनी पार्टी के अध्यक्ष जी तक पहुंचा दिया था."
समर्थन का आभार
उस मुलाकात के दौरान रामगोविंद चौधरी और मायावती, एक दूसरे को हाथ जोड़कर मिलते हुए दिखाई दिए थे. ये मायावती की अपनी स्टाइल से बिलकुल अलग उदाहरण था, राम गोविंद चौधरी भी बसपा के आलोचकों में गिने जाते रहे थे.
राम गोविंद चौधरी से मिले संदेश के बाद ही अखिलेश यादव 15 मार्च, 2018 को मायावती से लखनऊ स्थित उनके आवास पर मिलने पहुंचे. ये मुलाकात सवा घंटे चली, जिसमें अखिलेश यादव ने मायावती को समर्थन देने के लिए आभार जताया और ये भी याद दिलाया कि 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम जब आपस में मिले थे, तब दोनों ने बीजेपी को रोक दिया था.
इस मुलाकात के क़रीब एक सप्ताह बाद ये सवाल सामने था कि क्या अखिलेश, मायावती जी को रिर्टन गिफ्ट दे पाएंगे. राज्यसभा का चुनाव 23 मार्च को हुआ, जिसमें अखिलेश यादव तमाम कोशिशों के बाद भी बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार भीमराव आंबेडकर को जीत नहीं दिला पाए.
ऐसे में दोनों पार्टियों के बीच जो कांफिडेंस बिल्ड अप हो रहा था, उसको धक्का लगा. राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तब चुटकी लेते हुए कहा था, "समाजवादी पार्टी का अवसरवादी चेहरा लोगों ने देखा है, वह दूसरों से ले तो सकती है, दूसरों को दे नहीं सकती है."
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी थोड़े चिंतित ज़रूर हुए थे, लेकिन मायवती की प्रेस कांफ्रेंस ने वो चिंता दूर कर दी. मायावती ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि अपने उम्मीदवार की हार के बाद भी समाजवादी पार्टी पर उनका भरोसा कायम है और 'मेरी इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद बीजेपी वालों को फिर नींद नहीं आएगी.'
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